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Disasters can be avoided

Environmental Issues Editorial in Hindi

जागने का समय

मणिपुर में भूस्खलन परिहार्य है, मानव निर्मित कार्यों से संबंधित हैं

Environmental Issues

मणिपुर के नोनी जिले के तुपुल क्षेत्र में पिछले सप्ताह हुए भूस्खलन को राज्य में सबसे गंभीर प्राकृतिक आपदाओं में से एक के रूप में जाना जाएगा, जिसमें मरने वालों की संख्या 37 तक पहुंच गई है और 28 लोग मलबे के नीचे फंसे हुए हैं, जबकि बचाव कार्य जारी हैं। यह भयानक आपदा, भूस्खलन के मलबे से इजेई नदी का अवरुद्ध होने से और भी जटिल हो गयी है, जिससे बांध-नुमा (dam-like) पानी के एक बड़े कुँए जैसी संरचना बन गयी है, इसके टूटने पर यह निचले इलाकों को जलमग्न कर सकता है। जबकि प्रशासन ने संग्रहीत पानी के बहिर्वाह (outflow) को आसान करने का मार्ग ढूंढा है, खराब मौसम ने प्रयासों की गति को बाधित किया है और सरकार व आपदा प्रबंधन अधिकारियों को अब यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए कि आपदा के परिणाम इससे भी खराब हो सकते हैं।

यह तथ्य कि भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र के रेलवे निर्माण स्थल में ऐसी आपदा हुई है, इसने विकास योजनाकारों और सरकारी अधिकारियों को स्थिति विराम कर दिया है। जबकि उत्तरी भारत के हिमालयी राज्यों और केरल जैसे पहाड़ी / घाट इलाके वाले अन्य राज्यों ने सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक में भूस्खलन की अनेकों घटनाएं दर्ज करी हैं, मणिपुर में ऐसी घटनाओं की संख्या (2014 और 2020 के बीच 20) नगण्य नहीं है। इन भूस्खलनों से अपेक्षाकृत मौतों की अधिक संख्या और यह तथ्य कि पर्यावरण मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि आपदाएं “मानवजनित रूप से” प्रेरित थीं, राज्य के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। मंत्रालय ने मणिपुर में भू-स्खलन के कारणों की पहचान निम्न कारणों से की है; निर्माण के लिए ढलानों के संशोधन, सड़क के चौड़ीकरण, निर्माण सामग्री के लिए उत्खनन, नाजुक व जटिल भूगर्भीय संरचनाएं और भारी वर्षा।

कार्योत्तर अभ्यास के रूप में, राज्य सरकार को यह देखना चाहिए कि तुपुल क्षेत्र में रेलवे निर्माण कार्य के लिए स्थल चुनने से पहले पर्याप्त मिट्टी और स्थिरता परीक्षण किए गए थे या नहीं। शोधकर्ताओं ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि पश्चिमी मणिपुर में राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे के क्षेत्र बहुत अधिक, उच्च या मध्यम जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं। सरकार द्वारा राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण परियोजना (National Landslide Susceptibility Mapping project) के माध्यम से राज्य में अतिसंवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने के बावजूद तुपुल क्षेत्र में गंभीर भूस्खलन हुआ। भविष्यवाणियों की तुलना में इस साल मानसून के अधिक तीव्र होने के साथ बारिश की अनिश्चित प्रकृति ने समस्या को और बढ़ा दिया है। 

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India ) द्वारा भूस्खलन के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली अभी भी विकसित और परिष्कृत की जा रही है, जिसे  अघात-योग्य राज्यों में तैनात करने से ऐसी आपदाओं के पैमाने को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह समझ में आता है कि पूर्वोत्तर के राज्य अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के उत्थान के लिए कनेक्टिविटी परियोजनाओं को तेज करने के इच्छुक हैं, तुपुल में भूस्खलन जैसी आपदाएं वनों की कटाई से संबंधित पारिस्थितिक चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लेने के खतरों की ओर इशारा करती हैं। वह राज्य जो नियमित रूप से भूस्खलन के लिए प्रवण हैं, वहां की सरकारों के लिए जागने का समय है ।

Source: The Hindu (04-07-2022)
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