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बर्फ और अंगारे: लद्दाख के मुद्दे

Indian Polity Editorials

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Fire and ice: On Ladakh

लद्दाख और वहां के लोगों की ओर सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए

साल 2019 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र-शासित प्रदेश (यूटी) बनाए जाने के बाद से, मनोरम नजारे वाला लद्दाख उपेक्षित है। स्थानीय बौद्ध लोगों की लंबे समय की मांग के मुताबिक यूटी बनाए जाने के तत्काल बाद चंद दिनों का जश्न तो मना, लेकिन उसके बाद से वहां बेचैनी पसरी है। इस इलाके को संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत छठी अनुसूची (जिसमें आदिवासी आबादी के संरक्षण का जिक्र है) में शामिल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं।

जनवरी के आखरी हफ्ते, जब मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया, तो यह प्रदर्शन और भड़क उठा। अगस्त 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद से ही लद्दाख को नौकरशाही के अधीन कर दिया गया और स्थानीय लोगों को लगता है कि यह नौकरशाही पूरी तरह निकम्मी और गैरजिम्मेदार है। समय के साथ, नौकरशाही के साथ करगिल और लेह जैसे दो हिल काउंसिल के निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों के बीच की तकरार और बढ़ती गई।

पूर्व भाजपा नेता और पूर्व सांसद थुपस्तान छेवांग (वे काफी प्रभावशाली माने जाने वाले लद्दाख बौद्ध संघ के निर्वाचित अध्यक्ष भी हैं) की अगुवाई में लेह के राजनीतिक और धार्मिक निकायों ने मिलकर 2020 में लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) का गठन किया। करगिल जिले में नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और शिया-मुस्लिमों से जुड़े कई मदरसों ने मिलकर नवंबर 2020 में करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) बनाया। लेह के उलट, करगिल के लोग पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर के साथ दोबारा विलय करना चाहते हैं और धारा 370 के तहत विशेष दर्जा की बहाली चाहते हैं।

अपने राजनीतिक नजरियों में अंतर के बावजूद, एलबीए और केडीए अब कई साझे लक्ष्यों पर एक साथ हैं। उन्होंने केंद्र के सामने चार मुख्य मांगें रखी। इनमें पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली, छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा उपाय, लेह और कारगिल जिलों के लिए अलग-अलग लोकसभा सीट और स्थानीय लोगों के लिए नौकरी में आरक्षण की मांग शामिल हैं। वे इन मांगों को लद्दाख की पहचान, संस्कृति और नाजुक पर्यावरण की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

केंद्र दुविधा में है क्योंकि स्थानीय लोगों को आश्वस्त करने के लिए उसने जिन दो समितियों का गठन किया था, बीते दो साल में उन समितियों ने कुछ खास नहीं किया है। असल में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय की अगुवाई में इस साल बनी दूसरी समिति को तो स्थानीय लोगों का कोपभाजनन बनना पड़ा क्योंकि वे लोग जो मांग कर रहे हैं उसे पूरा करने का अधिकार ही इस समिति को नहीं दिया गया।

जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा खत्म करने और इस पूर्ववर्ती राज्य को दो भांगों में बांटने के सिर्फ 10 महीने बाद, साल 2020 में लद्दाख में चीन की बड़ी सैन्य घुसपैठ देखी गई। वह गतिरोध अभी भी अनसुलझा है। स्थानीय लोगों की वाजिब मांगों को पूरा करके उन्हें शांत करने के लिए उठाए जाने वाले कदम के अभाव में, इस इलाके में लोगों का गुस्सा तब तक भड़कता रहेगा और इसका फायदा परेशानी पैदा करने की मंशा रखने वाले लोगों को मिलेगा।

Source: The Hindu (03-02-2023)
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