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Redressing the police brutality and custodial deaths

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हिरासत में मौतों के लिए प्रौद्योगिकी कोई रामबाण इलाज नहीं है

यह कभी भी पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास के आधार पर दयालु पुलिसिंग का विकल्प नहीं हो सकता है

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पुलिस बर्बरता और हिरासत में हिंसा को लेकर भारत का गंभीर रिकॉर्ड है। 2001 और 2018 के बीच, पुलिस हिरासत में 1,727 लोगों की मौत हुईं, लेकिन केवल 26 पुलिसकर्मियों को इस तरह की मौतों के लिए दोषी ठहराया गया था। तमिलनाडु में हिरासत में हुई मौतों की हालिया घटना ने एक बार फिर पूछताछ के दौरान पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए तरीकों पर प्रकाश डाला है।

यह असामान्य ज्ञान नहीं है कि पुलिस, जब वे अपनी पूछताछ के प्रक्षेपवक्र से जब निराश हो जाते हैं, तो कभी-कभी यातना और हिंसा का सहारा लेते हैं जिससे संदिग्ध की मौत हो सकती है। जांच के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के लिए पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित करने पर भारी समय और धन खर्च किए जाने के बावजूद हिरासत में मौतें हो जाना आम हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुलिस कर्मी अलग-अलग पृष्ठभूमि और विभिन्न दृष्टिकोणों वाले मनुष्य हैं।

प्रौद्योगिकी का उपयोग

हिरासत में मौतों की समस्या को देखते हुए, प्रौद्योगिकी को कई लोगों द्वारा चांदी की गोली के रूप में प्रस्तावित किया गया है। हिरासत में होने वाली मौतों को रोकने में मदद करने के लिए कई तकनीकी समाधान उपलब्ध हैं। इनमें बॉडी कैमरा और स्वचालित बाहरी वितंतुविकम्पनित्र (Automated External Defibrillators/AED) शामिल हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रौद्योगिकी, पुलिस हिरासत में मौतों को टालने में मदद कर सकती है। उदाहरण के लिए, बॉडी कैमरे अधिकारियों को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। धोखे का पता लगाने के परीक्षण (Deception detection tests/DDTs), जो पॉलीग्राफ, नार्को-विश्लेषण और मस्तिष्क मानचित्रण (brain mapping) जैसी प्रौद्योगिकियों को तैनात करते हैं, जिससे एक अपराधी से उसके अपराध के बारे में मूल्यवान जानकारी हासिल करी जा सकती है, जो केवल उस अपराधी को पता होती है। DDT के बीच, ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग सिस्टम (BFS) एक अभिनव तकनीक है जिसे कई पुलिस बल अपने खोजी उपकरणों में जोड़ने पर विचार कर रहे हैं। BFS अपराधों को सुलझाने, अपराधियों की पहचान करने और निर्दोष संदिग्धों को बरी करने के लिए सहायक साबित हुआ है।

संघीय जांच ब्यूरो (FBI), केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CBI) और अमेरिकी नौसेना में BFS के लिए प्रयोगशाला और क्षेत्र परीक्षणों ने कोई त्रुटि नहीं दिखाई और कोई झूठी सकारात्मक और झूठी नकारात्मकता नहीं दिखाई। यह तकनीक जांच एजेंसियों को जटिल मामलों में सुरागों को उजागर करने में मदद करती है। जून 2008 में, भारत ने BFS उपकरण प्राप्त सबूतों से एक आरोपी को दोषी ठहराया। 2010 में, उच्चतम न्यायालय ने, सेल्वी बनाम कर्णाटक राज्य मामले में इससे प्राप्त साक्ष्यों को अस्वीकार्य बना दिया। अदालत ने कहा कि कोई भी राज्य किसी भी व्यक्ति पर उसकी सहमति के बिना नार्को विश्लेषण, पॉलीग्राफ और मस्तिष्क-मानचित्रण परीक्षण नहीं कर सकता। हालांकि, BFS परीक्षणों के दौरान खोजी गई कोई भी जानकारी या सामग्री, सूचित सहमति के साथ, सबूत का हिस्सा हो सकती है। चूंकि BFS उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी है, इसलिए यह महंगी है और कई राज्यों में अनुपलब्ध है।

पुलिस विभाग, निगरानी करने और बम का पता लगाने के लिए तेजी से रोबोट का उपयोग कर रहे हैं। कई विभाग अब संदिग्धों से पूछताछ के लिए रोबोट पूछताछकर्ता का उपयोग करना चाहते हैं। आज कई विशेषज्ञों का मानना है कि रोबोट, मानव पूछताछकर्ता की क्षमताओं के बराबर या उनसे अधिक प्रभावी पूछताछ कर सकते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य के मुकाबले रोबोटों को जवाब देने के ज्यादा इच्छुक हैं। अपने अध्ययनों से, मानव-कंप्यूटर सहभागिता (HCI/Human-Computer Interaction) के शोधकर्ता जोसेफ वीज़ेनबॉम ने निष्कर्ष निकाला कि संदिग्ध, पुलिस की तुलना में स्वचालित संवादात्मक समकक्षों (automated conversational counterparts) के प्रति अधिक ग्रहणशील हो सकते हैं जिससे वह खुलकर बोल सकते हैं। कृत्रिम बुद्धि (AI) और सेंसर तकनीक से लैस रोबोट संदिग्धों के साथ एक तालमेल बना सकते हैं, चापलूसी, शर्म और जबरदस्ती जैसी प्रेरक तकनीकों का उपयोग कर सकते हैं, और रणनीतिक रूप से शरीर की भाषा का उपयोग कर सकते हैं।

एरिजोना विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने रियल-टाइम  में सत्य आकलन के लिए स्वचालित आभासी एजेंट (Automated Virtual Agent for Truth Assessments in Real-Time/ AVATAR) नामक स्वचालित पूछताछ तकनीक बनाई है। कनाडाई सीमा सेवा एजेंसी ने पिछले साल AVATAR का परीक्षण किया था। HCI प्रणाली दृश्य, श्रवण, निकट-अवरक्त (near-infrared) और अन्य सेंसर का उपयोग करती है ताकि बातचीत के दौरान संदिग्ध की आंखों की चाल, उसकी आवाज और अन्य गुणों की जांच की जा सके। सिस्टम द्वारा जानकारी का एकत्रीकरण और इसका विश्लेषण अत्यधिक सटीक रहा है।

कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence/A.I.) और यंत्र विद्वता (Machine Learning/ML) पूछताछ के उपकरण के रूप में उभर रहे हैं। AI मानव भावनाओं का पता लगा सकता है और व्यवहार की भविष्यवाणी कर सकता है। इसलिए, ये भी विकल्प हैं। ML वास्तविक समय में वरिष्ठ अधिकारियों को सतर्क कर सकता है जब पुलिस द्वारा संदिग्धों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा हो।

वैध चिंताएं

कानूनी और नैतिक, दोनों रूप से AI या रोबोट पूछताछ के बारे में बहुत चिंता है। पूर्वाग्रह का जोखिम, स्वचालित पूछताछ रणनीति का खतरा, व्यक्तियों और समुदायों को लक्षित करने वाले यंत्र-विद्वता कलन-विधि (ML एल्गोरिथम) का खतरा, और निगरानी के लिए इसके दुरुपयोग का खतरा मौजूद है। इसलिए, जबकि पुलिस और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के लिए उपलब्ध तकनीक में लगातार सुधार हो रहा है, यह एक प्रतिबंधित उपकरण है जो हिरासत में होने वाली मौतों को खत्म नहीं कर सकता है। हालांकि यह आराम और पारदर्शिता प्रदान कर सकता है, यह कभी भी अंतर्निहित मुद्दों को संबोधित नहीं कर सकता है जो इन स्थितियों का कारण बनते हैं।

हमें कानूनी अधिनियमों, प्रौद्योगिकी, जवाबदेही, प्रशिक्षण और सामुदायिक संबंधों को शामिल करते हुए निर्णय-निर्माताओं द्वारा एक बहुआयामी रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है। 2003 में भारतीय विधि आयोग (Law commission) का साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) में बदलाव करने का प्रस्ताव इस संबंध में महत्वपूर्ण है, ताकि पुलिस पर, यातनाग्रस्त संदिग्धों के न होने के लिए, सबूत की जिम्मेदारी डाली जा सके।

इसके अलावा, डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में शीर्ष अदालत द्वारा जारी आदेशों का उल्लंघन करने वाले कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। यातना निवारण पर मसौदा विधेयक 2017 (Prevention of Torture bill), जिसने अभी तक दिन नहीं देखा है, को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी, पुलिसिंग को अधिक सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन यह पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास पर स्थापित दयालु पुलिसिंग के लिए कभी भी एक विकल्प नहीं हो सकती है।

Source: The Hindu (04-07-2022)

 About Author: के. जयंत मुरली,

आई.पी.एस.अधिकारी हैं

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