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Rising global food prices: Implications for India, export ban and its global impact

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बढ़ती वैश्विक खाद्य कीमतों के संकट से निपटना

दुनिया और खाद्य प्रणाली प्रबंधन हेतु सबक के साथ, विश्लेषण दिखाता है कि कृषि से असम्बद्ध बाहरी कारक जिम्मेदार हैं

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वैश्विक खाद्य कीमतें, साल-दर-साल अस्थिरता और आवधिक तेजी पर निर्भर करती हैं। जबकि साल-दर-साल की अस्थिरता को अधिकांश देशों द्वारा अपने व्यापार और घरेलू नीतियों में परिवर्तन के माध्यम से आसानी से प्रबंधित किया जाता है, इसके बावजूद, तीव्र और गंभीर आवधिक मूल्य (periodic price) वृद्धि, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर संकट का कारण बन सकते हैं। यह संकट, खाद्य पदार्थों की कमी, व्यापार में व्यवधान, भुखमरी और गरीबी के स्तर में वृद्धि और प्रसार, निवल खाद्य आयात (net food importing) करने वाले देशों के लिए विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) में कमी, खाद्य सुरक्षा जाल (food safety nets) पर खर्च में वृद्धि के कारण देशों के राजकोषीय संसाधनों (nation’s fiscal resources) पर दबाव, शांति के लिए खतरा और यहां तक कि कुछ स्थानों पर सामाजिक अशांति, के रूप में उभर सकता है। खाद्य मूल्य के झटकों(तीव्र वृद्धि/ shocks) के इन व्यापक प्रभावों के कारण, इनके वास्तविक कारणों को समझना और उनसे निपटने के लिए प्रभावी तंत्र तैयार करना अनिवार्य हो जाता है।

संकट और इतिहास

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन(UN FAO), विश्व बैंक /अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष(IMF) जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा संकलित खाद्य कीमतों पर ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चलता है कि 1960 के दशक की शुरुआत में हरित क्रांति प्रौद्योगिकी की शुरुआत और उसे अपनाने के बाद से, दुनिया खाद्य मूल्य संकटों से तीन बार टकरा चुकी है। पहला झटका 1973-76 के दौरान अनुभव किया गया था जब food price index/ खाद्य मूल्य सूचकांक (अमेरिकी डॉलर में कीमतों के आधार पर) सांकेतिक संदर्भ(nominal terms) में दोगुना हो गया और झटके के पूर्व चार साल के औसत की तुलना में वास्तविक संदर्भ(real terms) में एक तिहाई की वृद्धि हुई। इस झटके ने वस्तुओं (भोजन सहित) की सांकेतिक कीमतों (nominal prices) को एक नए रास्ते पर स्थानांतरित कर दिया। हालांकि, अगले दो दशकों के लिए, वास्तविक संदर्भ में खाद्य कीमतों में गिरावट की प्रवृत्ति को देखा गया जो 2002 के आसपास अपने सबसे निचले स्तर पर थी।

इसके बाद सांकेतिक के साथ-साथ वास्तविक भोजन की कीमतें बढ़ने लगीं; यह वेग बढ़ता गया जो 2008 में होने वाले अगले खाद्य मूल्य संकट में बदल गया, जो 2011 तक और भी ज्यादा तेजी से बढ़ गया था। जबकि 2014 के बाद कीमतों के झटकों में नरमी आना शुरू हो गयी, खाद्य कीमतें अपने पूर्व-2006 के स्तर पर वापस नहीं गईं। वैश्विक खाद्य कीमतों में सुस्ती 2015 से 2019 तक एक छोटी अवधि के लिए बनी रही, और खाद्य कीमतें फिर से 2020 की तीसरी तिमाही तक प्रवृत्ति से ऊपर जाने लगीं। इस बार खाद्य मूल्य सूचकांक में वृद्धि बहुत जल्दी हुई और यह बहुत बड़ी हो गई – इसने खाद्य मूल्य सूचकांक को अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है।

वैश्विक खाद्य कीमतों में यह वृद्धि जो 1960 के दशक के बाद से तीन खाद्य मूल्य संकटों में के रूप में प्रकट हुईं, वैश्विक खाद्य प्रणालियों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए कुछ प्रासंगिक सबक प्रदान करती है। 1973-1976, 2007-12 के दौरान सभी तीन खाद्य मूल्य संकट, और हाल ही में जो 2020 के अंत में शुरू हुआ था, इनमें एक बात समान है कि- वे उन कारकों द्वारा उत्प्रेरित किये गये थे जो कृषि से सम्बंधित नहीं हैं। वे संकट, कृषि उत्पादन में किसी गंभीर कमी के कारण नहीं थे। दूसरा, दो लगातार मूल्य झटकों के बीच का अंतराल काफी कम हो गया है और झटके की तीव्रता मजबूत हो रही है।

हाल ही का उछाल

आइए हम हाल ही में खाद्य कीमतों में हुए उछाल पर लौटें, जो कोविड-19 के कारण आपूर्ति में व्यवधानों की वजह से शुरू हुई है, जो रूस-यूक्रेन युद्ध से और बढ़ गई है। कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारक, जिन्होंने खाद्य कीमतों में वृद्धि और मूल्य झटकों (price shocks) के निर्माण में भी योगदान दिया है, उन्हें खाद्य वस्तुओं के उपयोग की व्यापार- पद्धति और संरचना से समझा जा सकता है। 

वर्तमान खाद्य मूल्य में उछाल, पहले वनस्पति तेलों में शुरू हुआ और फिर अनाज में विस्तारित हुआ। इन वस्तुओं की व्यापार- पद्धति से पता चलता है कि उत्पादित और खपत किए गए वनस्पति तेल का लगभग 38% का वैश्विक स्तर पर कारोबार किया जाता है। गेहूं के मामले में, वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए व्यापार पर निर्भरता 25% है, जबकि चावल के उत्पादन या खपत का केवल दसवें हिस्से का ही कारोबार किया जाता है। मक्का के लिए व्यापार निर्भरता 16% है। इससे यह स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार में व्यवधान का प्रभाव उन वस्तुओं के लिए अधिक होगा जिनका कारोबार अधिक से अधिक किया जाता है और इसके विपरीत । (vice-versa)

खाद्य कीमतों में बढ़ती प्रवृत्ति और उछाल के अंतर्निहित एक और कारक जैव ईंधन की जरूरतों के लिए भोजन का विचलन (diversion) है। बायोडीजल के लिए उपयोग किए जाने वाले वनस्पति तेल का अनुपात 2003 में 1% से बढ़कर 2011 में 11% हो गया; यह 2021 में 15% से अधिक हो गया। यह ऊर्जा की कीमतों से भी संबंधित है। जब कच्चे तेल की कीमतें एक निश्चित स्तर से परे बढ़ जायें, तो क्रमशः बायोडीजल और इथेनॉल बनाने के लिए तिलहन और अनाज का उपयोग करना किफायती हो जायेगा। जैव ईंधन के लिए खाद्य फसलों के उपयोग का दूसरा कारण नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों (renewable energy resources) की हिस्सेदारी को बढ़ाना है।

उर्वरक और अन्य कृषि रसायनों की कीमतों में वृद्धि के कारण वर्तमान और अगले फसली मौसम में खाद्य कीमतों में भी वृद्धि होने की उम्मीद है। अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 के बीच उर्वरक के अंतरराष्ट्रीय मूल्य में 150% की वृद्धि हुई है। यूरिया के एक बैग (50 किलोग्राम) की अंतर्राष्ट्रीय कीमत पिछले 15 महीनों में ₹ 1,000 से बढ़कर ₹ 3,000 से अधिक हो गई है।

भारत के लिए निहितार्थ

2020-21 के दौरान कृषि क्षेत्र में निर्यात और आयात, कृषि में सकल मूल्य वर्धन (gross value added) का 13% था। इसलिए, घरेलू कीमतों पर वैश्विक मूल्यों में वृद्धि का कुछ संचरण (transmission) अपरिहार्य है। घरेलू कीमतों पर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के संचरण को केवल तभी रोका जा सकता है जब कोई व्यापार न हो। घरेलू बाजार में वैश्विक कीमतों के इस संचरण को व्यापार नीति और अन्य साधनों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है। 

भारत उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हितों को संतुलित करने और अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता के खिलाफ अर्थव्यवस्था की रक्षा करने के लिए ठीक यही कर रहा है। जब अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बहुत कम हो जाती हैं, तो भारत, उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए सस्ते आयात पर लगाम लगा देता है; और जब अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बहुत अधिक हो जाती हैं, तो देश आयात को उदार बनाता है और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त उपलब्धता और उचित खाद्य मूल्यों को सुनिश्चित करने के लिए निर्यात पर लगाम लगाता है। खाद्य स्टेपल का बफर स्टॉक रखने की नीति भी विशेष रूप से वैश्विक खाद्य संकटों के मद्देनजर मूल्य स्थिरता बनाए रखने में बहुत सहायक रही है।

देश से खाद्य और कृषि अधिशेष को बढ़ाने के लिए कृषि निर्यात का महत्व बढ़ रहा है। घरेलू मांग और आपूर्ति में चल रहे रुझानों का मतलब है कि भारत को 2030 तक विदेशी बाजार में अपने घरेलू खाद्य उत्पादन का 15% निपटान(dispose) करने की आवश्यकता होगी। यह निर्यात-उत्पादन के वर्तमान अनुपात का दोगुने से अधिक है। यह एक विश्वसनीय और प्रमाणिक निर्यातक(reliable and credible exporter) के रूप में भारत की छवि बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हालांकि, दो स्थितियों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है: सामान्य निर्यात में विघ्न डालना और सामान्य स्तर से अधिक निर्यात को विनियमित(regulate) करना।

गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध

गेहूं के निर्यात पर हाल ही में प्रतिबंध और भारत द्वारा अन्य खाद्य वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल द्वारा उत्पन्न असामान्य स्थिति के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। कुछ विशेषज्ञ इसे (प्रतिबन्ध को) एक विश्वसनीय निर्यातक के रूप में भारत की छवि को खराब होते देखते हैं, क्योंकि इस कदम को (नियमित) निर्यात चैनलों को बाधित करने के लिए देखा जाता है। आंकड़ों की बारीकी से जांच करने से पता चलता है कि खाद्य निर्यात पर प्रतिबंध लगाने या प्रतिबंधित करने की भारत की कार्रवाई उसके सामान्य निर्यात को बाधित नहीं कर रही है। भारत गेहूं का एक बहुत छोटा निर्यातक था, 2015-16 से 2020-21 के दौरान वैश्विक गेहूं व्यापार में इसकी हिस्सेदारी 0.1% से 1% के बीच थी।

प्रतिबंध के बावजूद, भारत से इस वर्ष गेहूं का निर्यात हाल के वर्षों में, औसत गेहूं निर्यात की तुलना में बहुत अधिक होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार, रूस और यूक्रेन से गेहूं के निर्यात में व्यवधान की भरपाई के लिए लगभग 50 मिलियन टन गेहूं की तलाश कर रहा है। यह देश में गेहूं के उत्पादन का आधा है और बाजार में आने वाले गेहूं का दो तिहाई से अधिक है। यदि भारत ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया होता, तो इसके परिणामस्वरूप देश के भीतर गेहूं की भारी कमी हो जाती। कोई भी जिम्मेदार देश अतिरिक्त निर्यात की अनुमति देकर अपनी खाद्य सुरक्षा को खतरे में नहीं डालेगा। भारत को उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हितों को संतुलित करने के लिए पूर्व में अपनाई गई रणनीतिक उदारीकरण की नीति जारी रखनी चाहिए। बफर स्टॉक की नीति भी वैश्विक कीमतों के उछालों के सामने, कीमत की स्थिरता बनाए रखने में बहुत सहायक रही है।

वैश्विक प्रभाव

1970 के दशक से 1990 के दशक तक विकासशील देशों में फैली हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने खाद्य पदार्थों की कीमतों को कम और अपेक्षाकृत स्थिर रखने में मदद की। जैसे-जैसे हरित क्रांति प्रौद्योगिकी की भाप 21 वीं सदी की शुरुआत के साथ धीमी होती गयी, खाद्य पदार्थों की कीमतें वास्तविक सन्दर्भ में बढ़ने लगीं। साथ ही, कीमतों में उछालों के खिलाफ खाद्य क्षेत्र का लचीलापन भी कमजोर हो गया है। बड़े पैमाने पर गोद लेने के लिए दुनिया को हरित क्रांति प्रौद्योगिकी जैसी नई सफलताओं की आवश्यकता है, ताकि खाद्य कीमतों के तेजी से बढ़ने पर नियंत्रण किया जा सके। इसके बदले में कृषि अनुसंधान और विकास (विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र और बहुपक्षीय विकास एजेंसियों द्वारा) पर खर्च में वृद्धि की आवश्यकता पड़ेगी।

अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संबंधी परामर्शदात्री समूह (Consultative Group on International Agricultural Research/ CGIAR) के अंतर्गत वैश्विक कृषि अनुसंधान प्रणाली को सुदृढ़ और पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जो अव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। जैव ईंधन प्रोटोकॉल ने पिछले 15 वर्षों में दूसरी बार वैश्विक खाद्य संकट में योगदान दिया है। खाद्य फसलों और जैव ईंधन के लिए खाद्य उत्पादन के अंतर्गत भूमि के विचलन को खाद्य उपलब्धता के निहितार्थों के साथ सावधानीपूर्वक जांचा जाना चाहिए। ज्यादातर मामलों में, इसके लिए गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। 

पिछले तीन खाद्य मूल्य संकट मुख्य रूप से ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि और सीमाओं के पार भोजन की आवाजाही में व्यवधान के कारण हुए थे। जलवायु परिवर्तन से संबंधित कारक आने वाले वर्षों में आपूर्ति के झटकों का एक अतिरिक्त स्रोत होने जा रहे हैं। इसलिए, वैश्विक समुदाय को खाद्य कीमतों और आपूर्ति में उचित स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भोजन का वैश्विक बफर स्टॉक रखने की योजना बनानी चाहिए। इस स्थिति के लिए वैश्विक समुदाय द्वारा समन्वित और समय पर कार्रवाई की आवश्यकता है।

Source: The Hindu (14-06-2022)

About Author: रमेश चंद,

नीति आयोग के सदस्य हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं

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